छंगू की होली
( द्वारा - अमित कुमार पाण्डेय)
“ऐ...छंगुआ तोहिका सुनात नाहिंन का, यात्ति देआर होइगे अबै तक हुरदंग चालू है... बप्पा आवत होइहैं... देखि लिहिन तो प्राण निकाल लेहें” कमली चिल्लाते हुए अपने बच्चे को जिसका घर का नाम छंगू है और स्कूल का दीपक बुला रही है. छंगू कि उम्र यही कोई ७-८ वर्ष. दीपक या कहें छंगू एक आम बच्चा जिसमे शरारत है, मासूमियत है, नासमझी है या यूँ कहें वो सब कुछ जो इस उम्र के बच्चों में होता है. छंगू का घर गाँव के शिवाले के पूरब की ओर पासी टोले में है, खैर अब उसे पासी टोला बोलना ठीक नहीं है क्योंकि पंडितों के परिवार भी विग्रह होकर उधर ही बस रहे हैं या यूँ कहें कि गाँव के शहरीकरण के फलस्वारूप अब गाँव के तथाकथित उच्च वर्ग के लोग अपने सुधरे जीवन स्तर को दिखाने के लिये अपने पुरुखों के मिट्टी के कच्चे और बड़े घरों को छोड़कर निकम्मेपन की वजह से मरम्मत न करवा पाने के असमर्थता से इधर के ही टोले के पास अपने खेतों में शाहरीनुमा स्टाइल के छोटे-छोटे लेकिन आर.सी.सी. वाले घर बना के रहने लगे हैं. दरासल ये कमाल है इंदिरा आवास योजना का जिसके तहत प्रधान जी की चाटूकारिता और उनके आगे-पीछे घूमने का. हुआ ये कि गाँव के कुछ पंडितों को प्रधान जी से एक कमरा और बरामदा बनवाने के लिये ईंट और सीमेंट का रुपया मिल गया और उसी में एक और दो कमरे जोड़ने के लिये, जो थोड़ा बहुत कसर रह गई थी, अपनी एक-दो बीघे ज़मीन में से आधा-पौन बीघा बेचकर दो-तीन कमरों की कोठी जरूर ठुकवा ली. अब वही लोग इसे अपने जीवन का सबसे बड़ा कीर्तिमान समझते हैं कि जैसे एंटिलीया बनवा लिया हो. यही लोग अब दिन –भर पास के शिवगढ़ ब्लाक में चाय की दुकानों पर नील-टिनोपाल वाला मैला सफेद पैजामा-कुरता पहने और अखबार लिये, दूसरों के ऊपर चाय के लिये आश्रित होकर, देश की राजनीति और दुनिया भर की ख़बरों की चर्चा करते हुए नजर आयेंगे. उन्हें देखकर और सुनकर शहर के लोग यकीन तौर पे कम से कम पहली बार तो जरूर असमंजस में पड़ जायेंगे कि ऐसे बुद्धिजीवी लोग हमारे गाँवों में हैं फिर भी देश कि यह दुर्गति.... लेकिन अधिक समय तक यह भ्रम नहीं रहेगा कि आखिर ऐसा क्यों है |
हाँ.... तो बात हो रही थी छंगू यानी कि दीपक बाबु की. छंगू के घर में तीन सदस्य, एक वह स्वयं दूसरा उसका बाप हरिया और उसकी अम्मा कमली.यहाँ एक बात और बताने की है कि हरिया ने और बच्चों की कोशिश नहीं की छंगू के पैदा होने के तीन साल बाद कमली ने एक लड़की को जन्मा था लेकिन मरी हुई . उस समय शिवगढ़ के प्राथमिक चिकित्सालय में काम करने वाली मिडवाईफ़ ने कमली की हालत को देखकर चिल्लाते हुए हरिया को बोला था “नौ महीने ठीक से खिलाने का ताब नहीं था तो कहे को रात में कबड्डी खेलते हो. ये तो कहो जान बच गई जच्चे कि नहीं तो लुगाई से भी हाथ धोना पड़ता.” अब आते हैं सब के काम पर जो कि ऐसा है... कमली का काम है घर की देखरेख करना...हाँ.... कटाई के समय जरूर गाँव के कुछ चुनिन्दा लोगों के खेतों में काम करती है जिनके यहाँ लौनिहाई देने में किचिर पिचिर नहीं होती वो भी तब जब हरिया भी उसके साथ काम पर हो ताकि साल भर के अनाज कि थोड़ी बहुत व्यवस्था हो सके. नौ साल पहले जब हरिया के साथ ब्याह करके आई थी तो उसने खैर ये नहीं सोचा था कि वह कभी खेतों में काम पर जायेगी आखिर सोचे भी क्यों नहीं आखिर पासी टोले में तो उसके बराबर कोई बहुरिया पढ़ी-लिखी नहीं है. पूरे-पूरे कक्षा छः तक पढ़ी थी. अंग्रेजी के कुछ शब्दों के ज्ञान के अलावा ऐ, बी, सी, डी तो पूरी ही आती थी. हिंदी तो धड़ाधड़ पढ़ लेती है इसके अलावा मुह्जबानी हिसाब भी कर लेती है, ऐसा गाँव की उस टोले के औरतें कहती थीं. कुछ तो यहाँ तक कहती थीं की मिश्रयिन् और तेवेराईन् अपने आदमियों के पीछे कमली को बुलवाके घर के लोन-पानी तक का हिसाब करवाती हैं. कमली का नसीब शायद ठीक नहीं था जो उसके बाप ने इस घोडू हरियवा के हाथ इसको ब्याहा, एक दिन बाजपेयीन् दादी के मुँह से सुना था.
हरिया बिल्कुल...भुजंग करिया नाग की तरह शारीर, सामान्य कद, व्यवहार सीधा-साधा, अनपढ़, हर समय एक सा भाव चेहरे पर धोपे हुए और गदहे की तरह गाँव के भट्टे पर सुबह से शाम तक काम करने वाला. हरिया का घर जिसमे है एक कच्ची कोठरी, एक कच्ची दलान जिसपे दो-चार साल पुराना एक उजड़ा सा छप्पर | दलान के एक कोने में चूल्हा, एक तरफ अरगनी जिस पर टंगे हैं कपड़े सभी के और हर मौसम के मैले-कुचैले, रोज के बिछाने वाले बिस्तर जैसे फटे–पुराने चद्दर, कथरी और कपड़ों को ढूंसकर बनाई गई दो तकिया. रात को जिन्हें बिछाकर सोया जाता है और उठने के बाद जस के तस उधर ही डाल दिया जाता है.
मोटा-मोटी अब तक तो बहुत कुछ हरिया, कमली और छंगू के बारे में आप लोगों को समझमे आ गया होगा. यूँ कहें कि किसी तरह उनकी जिंदगी बैलगाड़ी कि तरह चूहुर-चूहुर करके चल रही थी. चूंकी काम सिर्फ हरिया करता है वो भी नियमित नहीं कभी-कभार मजदूरी जब चार महीना भट्टा बंद रहता है और भट्टे से भी कोई ज्यादा नहीं मिलता था. लुगाई क्योंकि थोड़ा बहुत पढ़ी लिखी थी और साथ ही साथ पंडितों के घर करीब थे तो हरिया के लिये ये बात थोड़ी बहुत उसके आत्मसम्मानसे जुडी थी कि उसकी लुगाई और पासियों की औरतों की तरह काम पर जाये. जाहिर सी बात है व्यक्ति पर जो प्रभाव आस-पास के माहौल से नहीं पड़ना चाहिए वो भी पड़ ही जाता है.
एक मायने में हरिया के घर का माहौल शांत था. आस-पास के पासियों और पंडितों के घर की तरह चिल्ल-पिल्ल, गाली-गलौज जैसा कुछ नहीं. सुबह होती छंगू या कहें दीपक बाबू तैयार होकर स्कूल में करवाया था जिसकी फीस १२० रूपये माह थी और १०० रूपये टेम्पो का भाड़ा था. कुल मिलाकर आमदनी का एक बड़ा हिस्सा दीपक बाबू की पढ़ाई पर खर्च हो रहा था. हरिया कभी भी फीस देने के मामले में देरी नही करता था. उसका सीना उस समय जरूर थोड़ा सा चौड़ा हो जाता था जब कभी कमली बताती की आज सज्जन भइय्या के यहाँ स्कूल से तगादा करने के लिये मास्टर बाबू आये थे तो किस तरह मिश्रईन् चाचीने झूठ बोला था कि चाचा नहीं हैं बाहर गए हैं और बाद में हिशाब कर दिया जायेगा. मास्टर बाबू भी जानते थे कि फीस के तो पैसे तभी मिलेंगे जब गेहूं बिकेगा या फिर धान. कभी-कभी सोचते थे कि साल में दो ही बार फीस देने का सिस्टम स्कूल क्यों नहीं कर देता. लेकिन क्या करें...स्कूल के प्राचार्य भेज देते थे और स्कूल के बाद साईकिल से चुहुरचुहुर-चुहुरचुहुर गाँव-गाँव तगादे के लिये भटकने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था.
हरिया भी खा-पीकर और पोटली में रोटी और साग बाँधकर और बिना भूले अपनी चिलम लेकर भट्टे पर चला जाता. भट्टे पर भूत की तरह कोयला तोड़ता या ईंट पाथता. बीच-बीच में गांजा लेकर चिलम में ठूंसता और और उसको जला के अपने साथियों के बीच एक वृताकार घेरे में उकडूँ की तरह बैठकर एक हाथ से दुसरे हाँथ में चिलम गुजरते हुए हरिया के पास आती और घुमती रहती. शाम होने पर जब चिडियाँ अपने बसेरे कि ओर लौटने लगतीं तो हरिया भी मुनीम से इजाजत लेकर अपनी मडइया की ओर कूच करता. घर आकर खाना खाता और छंगू से थोड़ी- बहुत बात करके सो जाता. छंगू को हरिया से बात करना कतई अच्छा न लगता क्योंकि अगर कभी हरिया को छंगुआ खेलते हुए मिल जाता या कुछ शैतानी करते हुए तो हरिया उसे मार-मार के अधमरा करके ही छोड़ता जब तक कि कमली बीच-बचाओ के लिये ना आ जाती और एक-दो हांथ उसे भी रशीद न हो जाते. इसके बाद यही होता की छंगुआ तो रो-रो के सो जाता और कमली जो खाना बना के रखती हरिया के सामने पटककर छंगुआ के बगल में पसरकर सो जाती. बचा हरिया, खाना होता तो खाता नहीं तो मुँह फुलाए चिलम जलाता और बड-बड करके कुछ देर बाद शांत हो जाता. ऐसा प्रोग्राम तभी होता जब छंगुआ पढ़ाई करता हुआ न मिलता. लेकिन ऐसा बहुत कम, क्योंकि कमली अक्सर उसे अपने पास बिठाये कुछ न कुछ पढ़ाते हुए मिलती जब उसके आने का वक्त होता. छंगुआ को पढतादेख हरिया को उसपे बड़ा लाड़ आता और तब न जाने कितने ही प्रलोभन उसे देता....इस चीज के लिये कभी उस चीज के लिये, शर्त ये रखता कि इम्तिहान में अच्छे नम्बर से पास होना है. छंगुआ ने कभी भी उन सभी प्रलोभनों को संजीदा होकर ध्यान में नहीं रक्खा कभी भी किसी भी चीज की गुजारिश नहीं की. शायद उसे इस बात का पूर्ण विश्वास था कि ये सब झूठ-मूठ के आश्वासन हैं. एक बात और कि, हरिया से तो उसे हमेशा डर ही लगता था. किसी चीज कि जरूरत भी होती तो अपनी अम्मा से कहता जो बाजार भी जाती थी और उसके लिये चीज भी लाती थी.
पिछले कुछ दिनों से सब कुछ सामान्य चल रहा था. हरिया के आने के पहले से ही छंगू अपनी अम्मा के पास कोई न कोई किताब लेकर बैठ जाता. उसके व्यवहार के इस परिवर्तन को कमली समझ नहीं पा रही थी लेकिन मन ही मन खुश थी कि...चलो, उसकी आँखों का तारा समझदार हो रहा है और उसकी धुंधली सी उम्मीद को इक बल मिल जाता था कि ‘जब छंगुआ बड़ा हो जायेगा और कंही नौकरी करेगा तो ये कच्चा घर पक्का हो जायेगा और कम से कम रोटी के लिये तो इतनी जद्दोजहद नहीं करनी पड़ेगी.’ अनिश्चित भविष्य के विचारों में खोई हुई कमली न जाने कब यथार्थ कि उलझनों में उलझती गई पता ही नहीं चला. वर्तमान कि वास्तविकता कि नब्ज पर हाथ रखते ही न जाने कैसी सरसराहट उपर से नीचे तक दौड़ गई जब उसने याद किया कि इस समय घर में पैसे न के बराबर हैं. छंगु कि फीस-फास देने के बाद इतने पैसे भी नगद नहीं बचे कि रोज-मर्रा की जरूरतों को भी पूरा किया जा सके.
कमली बड़ी समझदारी से खर्चा चलाती थी. एक पैसा क्या मजाल कि कोई दुकानदार फालतू लेले. बाजार जब जाती पहले इक कोने से दूसरे कोने तक सब सब्जीवाले दुकानदारों से भाव पूछतीं और जब इत्मिनान हो जाता कि फला सामान का क्या भाव है तभी कोई चीज खरीदती वो भी पूरा मोल-तोल करके. पास के गाँव के कुछ मुराई मूली, राई के पत्ते एक कोने में रख देते थे कि कमली आएगी तो ले जायेगी ये सोच कर कि किसी के तो स्वारथ लग जायेगा यहाँ तो पड़े-पड़े बेकार ही हो जायेंगे. अनाज तो बस उतना ही था कि रोटी खा लेते थे. दूसरों के खेतों की कटाई-निराई से जितना मिल जाता था उसी से गुजर करना पड़ता था.
सोचते-सोचते कमली को खयाल आया कि इस महीने तो होली भी हैं. थोड़ा सा तो खर्चा आखिर जात-बिरादरी के हिसाब से करना ही पड़ता है. खुद तो अपना चोला लेकर आदमी कैसे भी बसर कर ले लेकिन बच्चे के लिये और मिलने वालों के लिये तो कुछ न कुछ लाना ही पड़ेगा. यही सब सोचते हुए कमली छंगू के पास बैठी थी, विचारमग्न. तभी...
छंगू – “ अम्मा, अबकी होली पा हमका का लहियो.”
कमली पत्थर सी बैठी जैसे सुनाई ही नहीं पड़ा. छंगू झिझकोरते हुए- “ अम्मा, ओअ अम्मा.”
कमली अपनी बेसुधी से उठती हुई – “ हाँ, बचुवा का भवा. का कहत रहेव?”
छंगू- “अम्मा, अबकी होली मा हमका पिचकारी चाही. इ से पहिलेव नहीं लिहव रहय. हमय सब दोस्तन के पास बडी-बड़ी पिचकारी हैं. सब हमका चिढावत हैं. हमहुक पिचकारी लियय्क है नहीं तो हम पठेय न जाब देखि लिहो .” इसी तरह की बातों में दोनों लगे हुए थे कि तभी हरिया आता है और उनकी बातों को सुनते हुए कहता है- “ काहे नहीं...लाल...ई बार तुमका हम पिचकारी जरूर मँगवाउबे.” हरिया ने उनकी बात पर पूरी तरह विश्वास तो नहीं किया क्योंकी बाजार तो हमेशा अम्मा ही जाती थी और घर में पैसे हैं या नहीं ये जानकारी तो सिर्फ अम्मा को ही थी. वह जनता था कि बप्पा तो सिर्फ भट्टे तक जाते हैं और चिलम पीते रहते हैं. लेकिन फिर भी न जाने क्यों पिचकारी कि इक आस जरूर पाल लेता है.
इधर कमली इस उधेड़बुन में लगी है कि अबकी बाजार से क्या-क्या सामान लाना है और कितना खर्च लगेगा साथ ही साथ उसके ध्यान में वह पिचकारी भी है जिसे वह किसी तरह से खर्च में कटौती करके लाना चाह रही है. वह सोचती है...बाजार के दूसरे दिन होली. यानि ब्रहस्पतिवार की बाजार और शुक्रवार की होली.
कमली के मन की स्थिति को देखकर कभी-कभी मन यह सोचने पर विवश हो जाता है कि आखिर ये त्यौहार किसके लिये हैं. किसी के लिये उमंग और उल्लास और किसी के लिये विवशता और दुख. खैर ये बात भी सच है कि हमारे यहाँ त्यौहार कि महिमा दो ही वर्ग सधाय हुए हैं. एक वर्ग ऐसा जिनके पास असीमित धन है लुटाने के लिये और अपनी रहीसी को समाज के सामने प्रस्तुत करने का एक उचित अवसर. दूसरा कमली-हरिया जैसे लोगों का जिन्हें अपने बच्चे कि पिचकारी के लिये भी सोचना पड़ता है. ऐसा वर्ग जिनके पास सही अर्थो में कुछ भी नहीं है सिर्फ जी रहे हैं और त्योहारों के भार को विवशतावश ढो रहे हैं अपनी खुशी के लिये नहीं बल्कि दूसरों को दिखाने के लिये. एक निश्चित अंतराल पर ये त्यौहार आते हैं और कोसी नदी की बाढ़ की तरह जो भी संग्रह होता है अपने साथ बहा ले जातें हैं. इन त्योहारों को मनाना जरुरी हो जाता है लोक-लाज और जात-बिरादरी की वजह से. कमली की स्थिति ऎसी ही थी. साल का ऐसा समय जब कि न कटाई हो रही है न बुवाई है, न भट्टे की मजदूरी और न ही इतना अनाज की बेच कर होली का खर्च चलाया जा सके. नए कपडों का क्या कहें इस होली पर अगर गुछिया, पूड़ी, कचौड़ी और कोई तरकारी बन जाये और साथ ही साथ थोड़ा सा रंग, गुलाल और छंगुआ की पिचकारी आ जाये तो काम ही बन जाये. इस सब के लिये कम से कम सौ- सवा सौ रूपये तो चाहिए ही. कमली सामान की लिस्ट बनाती है जैसे- मैदा, सरसों का तेल, शक्कर, खोया, कदुआ, लौंग, इलाईची, सौंफ, रंग, गुलाल, और पिचकारी. मोटा-मोटी हिसाब किया तो लगा कि सौ– सवा सौ से काम नहीं चलेगा. जरूर कुछ न कुछ उधार लेना पड़ेगा. सोचा.. चलो कोई बात नहीं पहले देखतें हैं खर में कितने पैसे हैं. सब को खाना-पीना करवाके जब सो गएतो कमली दिया लेकर कोठरी में जाकर हंडिया-डोकिया खंघालने लगती है उन पैसों को जो उसने इकट्ठे किये थे, न जाने कितने जतनों से और कितने दिनों से. पगलाई सी कभी इस कोने में जाये कभी उस कोने में. सब खोज-खाज कर हिसाब किया तो कुल हुआ १३२ रूपये. तभी ध्यान आता है छंगुआ का गुल्लक जिसमे उसने कम से कम ३०-४० रूपये तो हैं ही. ५-५ के दो सिक्के तो उसने तभी डाला था जब उसकी बुआ और फूफा ने दिए थे जब पिछली बार वो आये थे. किसी तरह बढ़नी (झाड़ू) कि सींक से गुल्लक की दराज से और सोते हुए छंगुआ को देखकर अहिस्ता से धीरे-धीरे २० रूपये निकल लेती है. कुल १५२ रूपयों को इक चिथड़े में बाँधकर कोठरी के दरवाजे के पीछे बने अहरे में रख कर इस इत्मीनान से सोने के लिये आ जाती है कि कल दूसरे पहर बाज़ार जाकर होली का थोड़ा बहुत सामान लाया जायेगा ऐसा सोचती है. लेटे हुए उसने ये भी सोच लिया था कि बाजार जाते वक्त महुवारिन वाली मिश्राइन दादी से पचास रूपये उधर ले लेगी और जब भट्टे से मंजूरी मिलेगी तब वापस कर देगी. उन पर उसका बड़ा ही विश्वास था. कई बार जब छंगू बीमार-अजार होता तो उन्होंने ही तो मदद करी थी. कभी भी निराश नहीं किया.
कमली के मन में ये विचार भी आया कि होली वाले दिन मिलन-मिलाई के समय वह तोतैय्या रंग वाली चमकदार साड़ी पहेनेगी जो पिछले साल ही जमूनी कि अम्मा ने दिया था अपने लड़के के ब्याह पर. इक जोड़ी नई चड्ढी और बनियान थी छंगुआ के लिये और क्या चाहिए. हरिया के लिये भी इक गम्झा था उसे तब मिला था जब प्रधान भैया के पोते का जनेऊ था. उस वक्त ठीक ही किया जो उससे लेकर रख दिया नहीं तो अब तक उसके भी कचूमर निकालकर चिथड़ा बना देता. लेटे-लेटे होली के लिये नएकपड़ों का इंतजाम भी बनता ही गया. उसने राहत कि एक गहरी सांस ली और इस बात की शांति उसके अबतक के चिंतित चेहरे पर उमड़ आई थी कि, चलो, किसी न किसी तरह होली के त्यौहार का खर्चा निकल ही आएगा. आगे जो होगा देखा जायेगा आखिर किसी न किसी तरह गुजर बसर तो करनी ही है. इस आभाव भरे जीवन से कमली ने अब तक अपने आप को अभ्यस्थ कर लिया था. लेकिन जब कभी वह उन दिनों के बारे में सोचती है जब ब्याह नहीं हुआ था और हम उम्र की सहेलियों के बीच की हंसी-ठिठोलियों में भविष्य के हमसफ़र के साथ जीवन को जीने की उमंगें और उनसे जुड़े कल्पनायुक्त सपने और उनसे जुड़ी खुशियाँ तो उन सपनो में कभी भी वर्तमान का ये कुप्पघना अँधेरा जो तिल-तिल उसे रोज अपनी जिंदगी को ठोने के लिये मजबूर करता है, लेशमात्र भी उसका अंश कभी उसे छू कर भी नहीं गुजरा था. किसी भी विवाहिता के सपने, जो उसने अपने परिवार के लिये बुने थे कभी, अचानक बिना सोचे समझे, धीरे –धीरे टूटते हैं तो शायद उसकी अपनी आत्मा भी धीरे-धीरे हकीकत की जिंदगी में टूटती ही जाती है और इस आत्मिक दर्द को झेलते-झेलते वो इतना टूट चुकी होती है की और कोई भी सपना न उसे कभी गुदगुदाता है और न ही सहलाता है और जहाँ तक सपनों के आने का सिलसिला है वो भी धीरे-धीरे मंद ही होता चला जाता है.
सुबह का समय, ब्रहस्पतिवार का दिन यानि बाजार का दिन...कल की होली...यही सब सोचते-सोचते कमली घर में बुहार रही थी और घर के ठेरों कामों को निपटने की जद्दोजहद में लगी हुई थी की दोपहर तक फुर्सत से होकर बाजार जायेगी और छंगू को भी साथ ले लेगी. छंगू की भी चार दिन की छुट्टी थी. छंगू भी खुश था की आज तो पिचकारी मिलेगी ही और उसके बाद उसमे वो रंग भरके सोनू के ऊपर पिचकारी से रंग की फुहार डालेगा तो मजा ही आजायेगा और तो और वो भी धाक से अपनी नई पिचकारी दिखायेगा. सोनुआ की पिचकारी तो पुरानी भी हो गई. मन ही मन सोचता है की सोनुवा जब अपनी पिचकारी से जब उसकी मुट्ठी पकड़ कर दबाएगा और बाहर की खींचेगा और भक्क्से उसका हैंडल निकल जायेगा तब तक उसके पास उसे रंगने का मौका जरूर मिल जायेगा. हमेशा अपनी टूटी पिचकारी का धौंस दिखता है. आज तो अपनी नई पिचकारी से उसे मजा ही चखा दूँगा. साथ ही साथ उसके मन में कल की भी प्लानिंग चल रही थी की किसको-किसको और कैसे-कैसे रंग लगाना है. इन्ही सब के साथ कमली के पीछे-पीछे लगा उसकी धोती पकड़े-पकड़े घूम रहा था, एक साया की तरह. यह भी डर उसके एक कोने में था कि कंहीं कुछ गलती न हो जाये और मेरी पिचकारी न मिले तो मेरा सारा प्रोग्राम धरा का धरा रह जाये. हरिया भी आज भट्टे पर नहीं गया. मुनीम काका ने भट्टा का काम बंद रक्खा है, जो पुरबिया आए थे सब अपने-अपने घर गए हुए थे होली के लिये , ज्यादा आदमी काम करने वाले थे तो इस हरिया की ही क्या जरुरत, अकेले ये हरिया ही क्या भार फूंकता.
हरिया को तो खैर घर के कामों से कोई मतलब ही नहीं, जैसे इन सब से उसने वैराग्य ले रक्खा हो. उसको कभी भी ये खबर नहीं होती की घर में नमक है कि नहीं, आटा है कि नहीं, चूल्हा के लिये लकड़ी है कि नहीं, आदि. सवेरे रोटी मिल जाती तो उसके बाद भट्टा चला जाता और शाम को जब रोटी का समय होता तो भट्टे से अपनी मडईया की ओर चला आता. घर की जिम्मेदारी को निभाने के लिये बस इतना ही सपरता था कि जब तक भट्टे पर काम करता था वहाँ से मिलने वाले ९०० रूपये में से ८०० रूपये कमली के हाथ में थमा देता, १०० रूपये अपने पान-तम्बाकू के लिये रख लेता था. इसके बाद तो वह भूल ही जाता कि कुछ और भी परिवार की जिम्मेदारी बाकी है उस पर. हाँ.. ये सुध जरुर ले लेता था कि छंगूआ की फीस और टेम्पो का भाड़ा दे दिया गया है कि नहीं.
आज सुबह से ही सब अपने –अपने विचारों में मग्न नजर आ रहें हैं. तभी कमली कहती है, “ ये छ्न्गुआ का हमार पल्लू पकड़े पिछ्वाए हौ जाओ वैसी देख आओ बप्पा कहाँ हैं. देखाये परें तो बोल दिअऊ यह करकट उठाये के वैसी गडाही में डार देहें.”
छंगुआ भागते हुए गलियारे की तरफ जाता है. ‘बप्पा ओ बप्पा ..... आवाज लगाते हुए दौड़ा जा रहा है.’
हरिया जो कि गाँव के ही मुन्नू मिश्रा के साथ बैठा है, चिलम की फूंक छोड़ते हुए देखकर कहता है, “ ऐइ छंगुआ, का भवा, कहाँ सिर्री की तरह भागा जात है. आग लागि है का, का भवा.”
छंगू- “कुछू नहीं, बप्पा. बस अम्मा, बोलाइन हैं तुमका .”
हरिया- “अच्छा ठीक है, बोल दियो जाई कि आइत है.”
जिस उमंग से छंगू दौड़ते हुए आया था उसी तरह वापस घर की ओर दौड़ जाता है.
कमली-“ का रे, बप्पा कहाँ हैं.”
छंगू – “ बप्पा हियायें हैं, गलियारे मा, मुन्नू चाचा के साथ.”
न जाने क्यों मुन्नू चाचा का नाम सुनते ही कमली के चेहरे पर अजीब सी लकीरें उभर आती हैं और फिर अपने काम में लग जाती है.
थोड़ी देर बाद हरिया आता है और कमली ने जो कूड़ा-करकट इकट्ठा किया था, इक झवई में भरकर गडही में फेंकने चला जाता है. उसके बाद घर के उलूल-जुलूल काम काज करने के बाद कमली रोटी बनाने के लिये चूल्हा फूंकने लगती है. इधर हरिया भी कोठरी में न जाने क्या उठक-पटक लगाये है. थोड़ी देर बाद कमली आवाज लगाती है रोटी खाने के लिये.
कमली- “ओ छंगू के बप्पा, का कर रहे हौ, कहाँ हौ आओ पनेथी बन गए है, खा लियो आये, फिर हमका बजारोऊ जायेक है.”
हरिया (कोठरी से निकलते हुए) – “हमका अबै भूख नहींन तुम खा लिहौ अबै हमका कुछ काम है मुन्नू भैय्या के साथ, थोड़ी देर मा आइत है.”
कमली कुछ बोलना चाहती थी लेकिन इससे पहले कि वो कुछ बोल पाती हरिया जा चूका था.
हरिया के इस तरह चले जाने पर न जाने क्यों कमली के माथे पर इक सिकन सी आ जाती है फिर भी वह एक झटके के साथ अपने चेहरे पर छाई तनिक देर की बदली हुई रंगत को हटाते हुए रोटी को चिमटे से पकड़े हुए चूल्हे में घुमाती जाती है- घुमाती जाती है जबकि रोटी पूरी तरह से पाक चुकी होती है. इसके बाद चूल्हा-चौका खत्म करके वह छंगुआ को बुलाती है. उसके हाँथ- मुँह धोती है. धनिया-लहसुन का लोन और सरसों के तेल को रोटी में चुपड़ कर रोटी की डबलरोटी बना कर उसे दे देती है.
कमली-“ खा ले इसे जल्दी, मेरे राजा बेटा. आज तो तूने अपनी अम्मा के काम में बड़ा हाँथ बँटाया. हूँ... मेरा बच्चा.”
छंगू( कुछ सकुचाते हुए)- “अम्मा, पिचकारी कब लहियो. होली तो कालिंह हैं न.”
कमली- “ हाँ, जानित है. ताबैहनै तौ कहित है जल्दी खा लियो. तब तक बप्पा आवात होहिहें वहिके बाद बाजार जायके तुमका पिचकारी लै द्याब. हमहूँ चाल्बे तुमहूँ चलेओ ठीक.”
छंगू ‘हाँ ‘ में सर हिलाता है और हूँ..हूँ..हूँ.. की आवाज निकालते हुए रोटी चबाते जाता है. कमली उठती है और जो भी बर्तन थे उन्हें समेटते हुए भूसी से मांज आती है.चूल्हा भी पोत आती है. अब थोड़ी- थोड़ी परेशानी उसके चेहरे पर उभरने लगती है की न जाने इतनी देर हो गई अभी तक छंगू के बप्पा को होश नहीं, पता नहीं कौन से लाम पे गए हैं.
दिन के तीन बज रहे हैं बजरहिया सब जाने लगे हैं. जगजीवन चाचा आवाज लगाते हैं... का रे... छंगुआ अम्मा बाजार न जहियें का. जाएँ तो कही देहें हमरे लिये तम्बाकू-चून लै अहियें. लियो ५ रुपैय्या. छंगुआ दौड़ के काका से ५ रुपैय्या ले आता है. इधर कमली भी दो रोटी लेकर टमाटर, मिर्ची, लहसुन और नमक के टोर्रआ की पीसी चटनी के साथ खाने बैठ जाती है. यह सोच कर की न जाने हरिया कब आएगा और कौन सा वो सदा उसी के खाने के बाद खाती है. इतनी देर तलक तो इन्तजार किया.
अभी दो कौर हलक से नीचे ही उतरे थे कि इतने ,में सोनू कि अम्मा अपने चबूतरे से आवाज लगाती हैं, “ ओ कमली...ओ कमली.... अरे कमलिवा.... न जाने कहाँ मर गै है, सुनतै नहिं.”
कमली जैसे ही आवाज सुनती है, खाना इक तरफ छोड़ के अपने पल्लू को सर से ढकते हुए गलियारे के दांईं ओर से जाते हुए आवाज के प्रत्युत्तर में कहती है – “ का है मह्तारिया, का भवा.”
सोनू की अम्मा – “ भवा का, अरे तोहिका कौनो ख्याल-व्याल है कि नाही. कुछु जनतू है हरिया कहाँ परा है. मुन्नू नासिकाटे के साथ दारु पी के पिछवाड़ेवाले घूर पर पड़ा है. सुना है घंटन से फुलवारी मा दारु-जुआ चालत रहा. यह तो काहौ सोनुआ देखि लिहिस तौ हमका बताईस. जाओ छिदाये लाओ. नाही तौ परा रही जब तक नशा हिरन न होई.”
यह सुनते ही उसे पहले-पहल तो विश्वास ही नाही हुआ लेकिन फिर भी छंगुआ को ठेलते हुए बोली-“ जा देख जाये, बप्पा उन्हां घूरे प् पड़े हाँ का ....” और कहते–कहते खुद भी अपने कदमो को रोक नाही पाई, और उसके पीछे चल दी शायद उसे अब भी यकीन नही हो रहा था कि हरिया क्या ऐसा भी कर सकता है जबकि घर की दशा उससे छिपी नही है. पहले तो कभी उसने दारु पी नहीं फिर इस बार ऐसा क्यों. कमली के लिये भी ये शायद पहला मौका था की उसने पिछौरी नहीं पहनी थी नहीं तो मजाल है कभी भी बिना पिछौरी के बाहर निकली हो चाहे गाँव का कोई घर हो या बाजार- हाट या खेत खलिहान ही क्यों न जाना हो. पंडितों की बहुरियों की तरह पिछौरी ओढ़ के ही जाती थी, इसके बावजूद की घर में कोई रोक-टोक नहीं थी. आखिर रोक-टोक भी किसकी हो न सास थी और न ही ससुर.
घूर के पास पहुँचते ही कमली ने वही देखा जिसका वर्णन सोनू की अम्मा इतनी ख़ूबसूरती से कर रही थी. हरिया को बिहोशी की हालत में घूर पर पड़ा हुआ देखकर एकाएक उसके मुँह से निकला- “ हाय दैय्या, इनका शर्मो न आई ई सब नाटक करत हुए. लरका –बच्चन कै कौनों ख्याल तक नहीं करिन.”
हरिया घूर के पास पड़ा हुआ, अर्धमृत अवस्थामें.मुँह से लार लटकी हुई. नथुने से प्रत्येक सांस की आवाजाही से नाक के पानी का बनता और बिगड़ता हुआ छोटा सा गुब्बारा सुर्र-सुर्र की आवाज के साथ. बाल बिखरे हुए. अस्त-व्यस्त कपड़े घूर के गोबर और करकट से सने हुए. ऐसी सुकून भरी नींद में जो शायद किस्मत वालों को ही नसीब होती है ऐसा अहसास कराते हुए. लगता है जैसे घूर का नरमपन उसे पंचसितारे होटल के नरम गद्दों का अहसास करा रहा है और वो खो जाना चाह रहा हो इस सुखद अनुभूती में. उसका साथ देने के लिये आजू-बाजू मक्खियाँ जरुर भिनभिना रहीं थीं. उनका संगीत उसे और अधिक मदहोशी का अहसास कराता हुआ प्रतीत हो रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे वो इसमें डूबता जा रहा है.
छंगू अपने बप्पा की ये दशा देखकर तो रोने लगा लेकिन कमली ने किसी तरह उसे उठाने की कोशिश करी तो बेहोशी की हालत में हरिया हूँ...हूँ...हूँ करके वैसे ही पड़े रहने की जिद्द जैसे कोई छोटा बच्चा सुबह बिस्तर छोड़ने के लिये करता है. पास खड़े गाँव के लड़के और नवयुवक हरिया के इस ड्रामे को देखते हुए मुस्कुरा रहे थे और आपस में बातें कर रहे थे और कमली बेचारी जैसे अपनी ही नजरों में धरती में गड़ी जा रही हो. तभी रामसजीवन काका का बड़ा लड़का कमली के पास आता है-“ भौजी... तुम नाहक लगी हो चलौ जाओ घरै हम भैय्या का लाईत है. किसी तरह वो लड़का हरिया को संभालकर उसके बहकते हुए कदमो के सहारे उसकी मडैइया तक पहुंचा जाता है तब तक कमली घर की टूटी खटिया बिछा चुकी थी जिस पर हरिया धडाम से पसर पड़ता है.
अब तक कमली के मन की स्थति आप भांप चुके होंगे. उसके मन में उठने वाले प्रश्न ज्वार-भाटे की तरह उसके मन की गहराइयों में हिलोरें ले-लेकर थपेड़े मार रहे थे. उससे न चिल्लाते बन रहा था और न ही अपने को शांत करते हुए. मन के घुमड़ते हुए भंवर जैसे उसे घुमा रहे हों और उस पर भी इक बेहोशी हावी होने को तैयार हो रही हो. वह क्या करे...किस पर चिल्लाये...एक घुटन...उसे अव्यवस्थित कर रही थी. चेहरे पर भावशून्यता झलक रही थी और किंकर्तव्यविमूढ़ सी वह खटिया की पाटी के साथ पाटी बनी वह बैठी हुई थी.
छंगू भी कमली के बगल में बैठा हुआ शुगबुगा रहा था लेकिन उसे गुजरता हुआ दिन और ढलती हुई शाम अंदर ही अंदर और कचोट रही थी. आखिरकार उसने अम्मा से पूँछ ही लिया – “औ अम्मा, हमार पिचकारी.”
कमली कुछ नहीं कहती और उसकी तरफ देखते हुए पाटी को पकड़कर उठती है. अनमने मन से कोठरी के झरोखे में रखे पैसों को लाने के लिये ताकि किसी बाजार जाने वाले से कहकर पिचकारी मँगवा दे लेकिन उसके पैर उसे आगे बढने से न जाने क्यों रोकतें हुए, शायद उसे कुछ अहसास करने की जद्दोजहद में लगे हुए.
कमली कोठरी का दरवाजा ठेल कर झरोखे में हाथ डालती है कई बार उसके हाथ इधर से उधर .....उधर से इधर कई बार डोलती हैं लेकिन हांथों की उँगलियां सिर्फ खरोंच के साथ लाती हैं तो सिर्फ मिट्टी की धूल....सिर्फ मिट्टी की धूल... कमली बार–बार हाँथ झरोखे में डालती है. दौड़ के जाती है दिया जलाती है और झरोखे में झांक-झांक के देखती है लेकिन नजर में आती है सिर्फ और सिर्फ मिट्टी की धूल.
कमली को हताशा घेरे हुए थी और अब तक उसे सब कुछ स्पष्ट समझ में आ रहा था की आखिर उसके जमा किये हुए रुपयों का क्या हश्र हुआ है. उस आवारा और नशेड़ी मुन्नू का नाम सुनते ही इक बार तो जरूर उसे थोड़ा सा अटपटा लगा था लेकिन कुछ ऐसा होगा इसका आभास तो उसे बिलकुल ही नहीं था. वह वन्ही देहरी पर बैठ गई. आँखें जो अब तक सुखी हुई थीं, उनसे नमकीन धारा बह रही थी और उस धारा में न जाने कितने ही रंग आपस में मिले जा रहे थे. एक अथाह रंगीन सागर में वे धाराएँ उसे डुबाये जा रही थीं. हरिया अचेत, खटिया पर पड़ा रंगीन दुनिया के सपनों में खोया हुआ था. बाकी बचा छंगू वह भी कमली को देखकर अपने आप को भिगो रहा था अपनी आँखों के बहते हुए पानी से. सबने अपने आप को भिगो लिया था, होली से एक दिन पहले ही. सब होली खेल रहे थे, अपने-अपने तरह की होली. सूरज डूब रहा था और छंगू की आँखों से झरने वाली बूंदों से गुजरने वाला प्रकाश का इन्द्रधनुषीरंग उसे सपनों की दुनिया में ले जा चुका था, जहाँ वो अपनी पिचकारी में रंग भर –भर के सोनुआ के साथ होली खेल रहा है उन्मुक्त.........
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Wednesday, 8 March 2017
Chhangu ki holi
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